तमिलनाडु में बीजेपी ने खेला जाति कार्ड, लेकिन क्या ये कामयाब होगा?
तमिलनाडु में मतदान की तारीख़ क़रीब आ रही है. इसी बीच केंद्र सरकार ने एक क़ानून पारित कर दक्षिण तमिलनाडु की सात अनुसूचित जातियों को 'देवेंद्र कूला वेल्लालुर' नाम देकर एकजुट किया है.
क्या जातियों को इस तरह एकजुट करने से बीजेपी को फ़ायदा मिलेगा?
माना जाता है कि कन्याकुमारी और तमिलनाडु के पश्चिमी ज़िलों में बीजेपी मज़बूत हो रही है. ये कहा जा रहा है कि कन्याकुमारी में नादर समुदाय और पश्चिमी ज़िलों में गौंडर समुदाय को क़रीब लाकर बीजेपी मज़बूत हुई है.
अब बीजेपी दक्षिण तमिलनाडु की अनुसूचित जातियों को आकर्षित करने के प्रयास में है. इसी क्रम में जातियों को 'देवेंद्र कूला वेल्लालुर' की संज्ञा दी गई है. लेकिन क्या बीजेपी को दूसरे ज़िलों में भी इस जाति आधारित एकीकरण से मदद मिली है?
माउंट कार्मेल कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर अरुण कुमार कहते हैं, "हो सकता है कि हिंदूवादी संगठनों को कन्याकुमारी में जाति के आधार पर लोगों को एकजुट करने से मदद मिली हो. लेकिन दूसरे ज़िलों में ये रणनीति कारगर नहीं रही है. वहां रणनीति क्यों नाकाम हुई ये समझने के लिए हमें ये देखना होगा कि कन्याकुमारी में हिंदू संगठनों ने किस तरह अपनी जड़ें जमाई हैं. यहां इस रणनीति ने काम किया और समर्थन वोटों में बदला.'
भारत की आज़ादी के बाद साल 1956 तक कन्याकुमारी केरल का हिस्सा था. कन्याकुमारी के तमिलनाडु राज्य में शामिल होने से पहले ही यहां हिंदू संगठनों ने पैर पसारने शुरू कर दिए थे.
प्रोफ़ेसर कुमार कहते हैं, "कन्याकुमारी ज़िले में आरएसएस की पहली शाखा साल 1948 में पद्मनाबापुरम महल में लगी थी. 1963 में हुए सांप्रदायिक दंगों ने भी यहां हिंदू संगठनों को मज़बूत किया. विवेकानंद मेमोरियल के बनने से पहले ही वहां मा. पो शिवगननम ने उस जगह को विवेकानंद चट्टान का नाम देते हुए तख़्ती लगा दी थी. वहां के ईसाई लोगों ने इस जगह को ज़ेवियर रॉक बताते हुए कड़ा विरोध भी किया था. जब उस नामपट्टी को तोड़ दिया गया तो दंगा हो गया. फिर उस जगह पर विवेकानंद मेमोरियल बना. लेकिन दोनों ही समुदायों के दिलों में उस दंगों के जख़्म ताज़ा रहे."
इस ज़िले में द्रविड़ विचारधारा की पार्टियों की गतिविधियों का भी कोई ख़ास असर नहीं हुआ. कन्याकुमारी में 80 फ़ीसद आबादी नादर समुदाय की हैं. इसमें हिंदू नादर और ईसाई नादर दोनों शामिल हैं. अय्या समूह भी इनसे निकले हैं. यदि आर्थिक नज़रिए से देखें तो ईसाई नादरों के हालात बेहतर थे. इसके बाद अय्या समूह थे और फिर हिंदू नादर तीसरे नंबर पर थे. ऐसे में आर्थिक स्थिति में फ़र्क़ की वजह से हिंदू नादरों को धर्म के आधार पर एकजुट करना आसान था.
जब तक कामराज वहां थे, ये अंतर तो था लेकिन बहुत बड़ा नहीं था. लेकिन 1982 में हुए एक दंगे के बाद धानूलिंगा नादर ने कांग्रेस छोड़ दी और हिंदूवादी फ्रंट में शामिल हो गए. इसके बाद से यहां हिंदू संगठन मज़बूत ही होते गए हैं. इन संगठनों ने आर्थिक स्थिति में फ़र्क़ को सामाजिक भेदभाव की तरह पेश किया और लोगों को धीरे धीरे एकजुट करते गए.
प्रोफ़ेसर अरुण कुमार कहते हैं, "1982 के दंगे के बाद हिंदू नादरों में एक बड़ी हिंदूवादी लहर चली थी. 1984 में पद्मनाभपुरम सीट से हिंदू फ्रंट का उम्मीदवार जीत गया था. ये पहला मौका था जब किसी हिंदू संगठन के उम्मीदवार को तमिलनाडु में जीत मिली. इस जीत के बाद कन्याकुमारी में कई शाखाएं स्थापित की गईं थीं."

कैसे बदलीं स्थितियां?
कन्याकुमारी ज़िले में आमतौर पर राष्ट्रीय पार्टियां मज़बूत रही हैं. लेकिन 2009 के चुनावों में यहां डीएमके के हेलेन डेविडसन जीत गए थे. तब तक कन्याकुमारी में कोई प्रांतीय पार्टी नहीं जीती थी. आज़ादी के बाद और कन्याकुमारी के तमिलनाडु में शामिल होने के दौरान भी कांग्रेस के लिए यहां राष्ट्रवादी विचारधारा फ़ायदेमंद साबित होती थी. हालांकि मार्शल नेसामणी और कामराज के निधन के बाद हिंदू नादरों ने हिंदू संगठनों के क़रीब जाना शुरू कर दिया था.
अरुण कुमार बताते हैं, "इस सबके बीच, बीजेपी यहां हिंदू नादरों के अलावा दूसरी जातियों को आकर्षित करने की कोशिशें भी कर रही थी. वो पद्मनाभपुरम में रहने वाली एक ख़ास जाति कृष्णावगाई को आकर्षित करने में रूचि ले रही थी. बीजेपी दूसरी जगहों पर भी ऐसी जाति आधारित एकजुटता बनाने में लगी थी. लेकिन बीजेपी के ऐसे प्रयास कन्याकुमारी के बाहर दूसरे ज़िलों में कारगर होते दिखाई नहीं देते हैं."
मदुरै के एक शोधकर्ता नाम न ज़ाहिर करते हुए कहते हैं, "यदि किसी बाहरी के नज़रिए से देखें तो बीजेपी एक धार्मिक पार्टी लगती है. लेकिन वह जाति पर ज़्यादा ध्यान देती है."
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